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Thursday, 26 March 2015

सत्यवादी हरिश्चंद्र

बहुत जमाने पहले की बात है। राजा हरिश्चंद्र सच बोलने और वचन. पालन के लिए मशहूर थे। उनकी प्रसिद्धि चारों तरफ फैली थी। ऋषि विश्वामित्र ने राजा हरिश्चंद्र की प्रसिद्धि सुनी। वे स्वयं इसकी परीक्षा करना चाहते थे। क्या हरिश्चंद्र हर कठिनाई झेलकर भी वचन का पालन करेंगे? आओ देखें कि विश्वामित्र ने कैसी परीक्षा ली?,
सतयुग में राजा हरिश्चंद्र नाम के एक राजा थे। राजा हरिश्चंद्र दानी थे और वचन के पक्के थे। वे जो वचन देते, उसे अवश्य पूरा करते। उनके बारे में कहा जाता, चाँद और सूरज भले ही अपनी जगह से हट जाएँ, पर राजा हरिश्चंद्र अपने वचन से कभी पीछे नहीं हट सकते। राजा हरिश्चंद्र की तरह ही उनकी रानी शैव्या और राजकुमार रोहिताश्व भी वचन का पालन करना अपना कर्तव्य मानते थे।
राजा की प्रसिद्धि दूर-दूर तक फैल गई। ऋषि विश्वामित्र ने राजा हरिश्चंद्र की परीक्षा लेने का निश्चय किया। उसी रात राजा हरिश्चंद्र ने एक सपना देखा। सपने में उन्होंने देखा, ऋषि विश्वामित्र को राजा ने अपना पूरा राज-पाट दान में दे दिया है।
आँख खुलने पर राजा ने सोचा, अगर सपने में भी उन्होंने अपना साम्राज्य मुनि विश्वामित्र को दान में दे दिया, तब अपने साम्राज्य पर उनका कोई अधिकार नहीं रह गया है। प्रातःकाल विश्वामित्र साधु के वेष में राजा के महल में पहॅुंचे। राजा हरिश्चंद्र ने उन्हें प्रणाम कर पूछा-
”मेरे लिए क्या आज्ञा है मुनिवर?“
”जो माँगूँगा दे सकोगे राजन्?“ मुस्कराकर ऋषि ने पूछा-
”मेरा सब कुछ आपका ही है ऋषिवर। बताइए क्या सेवा करूँ? राजा हरिश्चंद्र ऋषि विश्वामित्र को पहचान गए थे।“
”मुझे तुम्हारा पूरा राज्य, धन-संपत्ति और खजाना चाहिए।“
”यह सब तो पहले ही आपको दे चुका हूँ एऋषिवर।“ मुस्करा कर राजा ने कहा।
”वह कैसे राजन्?“ ऋषि विश्वामित्र आश्चर्य में पड़ गए।
”आज रात सपने में ही अपना पूरा राज-पाट, धन-संपत्ति आपको दे चुका हूँ, मुनिवर। अब मेरा सब कुछ आपका है।“
”मुझे खुशी है, तुम अपने वचन के पक्के हो राजन्। चलो, तुम्हारा साम्राज्य अब मेरा हुआ। अब बताओ दक्षिणा में तुम क्या दोगे?“ ऋषि उनकी पूरी परीक्षा ले रहे थे।
राजा सोच में पड़ गए। वह जानते थे दक्षिणा के बिना दान पूरा नहीं होता। कुछ देर सोचने के बाद उन्होंने कहा-
”मुनिवर, अब तो हमारे पास केवल हमारे शरीर बचे हैं। काशी नगरी के बाजार में हम अपने को बेचेंगे। जो मूल्य मिलेगा, वही आपकी दक्षिणा होगी।“
राजा अपनी रानी और पुत्र के साथ काशी की मंडी मे गए। वहाँ उन्होंने कहा- ”हम तीनों अपने को बेचने आए हैं। जो हमें खरीदेगा, हम उसकी जीवन भर सेवा करते रहेंगे।“
बाजार में एक डोम आया था। उसके पास बहुत काम था और उसे एक नौकर की आवश्यकता थी। डोम ने राजा को खरीद लिया। एक ब्राह्ममण ने रानी शैव्या और राजकुमार रोहिताश्व को खरीदा। राजा होकर भी हरिश्चंद्र ने एक डोम के यहाँ काम करना स्वीकार किया। वह उसकी हर तरह से सेवा करते। छोटे-से-छोटे काम करने मेें भी न हिचकते।
रानी शैव्या और राजकुमार रोहिताश्व ब्राह्ममण परिवार की सेवा करते। एक दिन रोहिताश्व ने माँ से पूछा-
”माँ, हम राजमहल में रहते थे, हमारे यहाँ इतने दास-दासी थे। अब हम दूसरों के यहाँ काम करके रूखा-सूखा क्यों खाते हैं?“
”बेटा, वचन का पालन करने के लिए तुम्हारे पिता ने अपना सब कुछ दान में दे दिया। अब हमारे पास कुछ नहीं बचा है।“
”माँ, पिता जी ने अपना पूरा राज-पाट खजाना, सब कुछ दान में क्यों दे दिया?“
”बेटा, तुम्हारे पिता जी से अगर कोई कुछ माँगे तो वह देने में कभी नहीं चूकते। वे दानी हैं। ऋषि, विश्वामित्र ने तुम्हारे पिता से उनका साम्राज्य माँगा। तुम्हारे पिता ने सहर्ष अपना साम्राज्य उन्हें दान में दे दिया। बताओ क्या उन्होंने गलती की?“
”नहीं माँ, पिता जी ने ठीक ही किया है। लेकिन वे हमारे साथ क्यों नहीं रहते?“
”वे एक दूसरी जगह रहकर अपने कर्तव्य का पालन कर रहे हैं, पुत्र। अब अपने शरीर पर भी हमारा अधिकार नहीं है।“
”वो क्यों माँ?“
”हमारे शरीर बेचकर जो मूल्य मिला, वो ऋषि विश्वामित्र को दक्षिणा में दे दिया गया। अब हमारे शरीरों पर हमारे स्वामी का अधिकार है। वह हमें जैसे रखेंगे, हम वैसे ही रहेंगे। उनकी सेवा करना हमारा धर्म है।“
”ओह माँ, पिता जी बहुत महान हैं। मैं जानता हूँ आने वाले समय में लोग पिता जी को बहुत आदर देंगे। उनका यश दूर-दूर तक फेलेगा।“
”तेरे पिता जी ने जो किया है, वह नाम या यश पाने के लिए नहीं किया पुत्र। उनका यही स्वभाव है।“ रानी ने बेटे को समझाया।
”तुम ठीक कहती हो, माँ।“
बहुत दिन बीत गए। राजा हरिश्चंद्र, रानी शैव्या और राजकुमार रोहिताश्व तन-मन से अपने-अपने मालिकों की सेवा करते रहे। उनके कष्ट देखकर भगवान का दिल भी पसीज गया। विश्वामित्र की परीक्षा पूरी हुई। विश्वामित्र ने राजा हरिश्चंद्र के पास जाकर कहा-
”तुम्हारी परीक्षा पूरी हुई एराजन्। तुम परीक्षा में खरे उतरे। वचन-पालन, दान और सच्चाई के लिए तुम्हारा नाम हमेशा आदर के साथ लिया जाता रहेगा। मैं तुम्हें तुम्हारा पूरा साम्राज्य वापस लौटाता हूँ।“
”नहीं मुनिवर, दिया हुआ दान वापस लेना अधर्म है। अब इस साम्राज्य पर मेरा कोई अधिकार नहीं है।“ हाथ जोड़कर राजा ने अपना राज्य वापस लेना अस्वीकार कर दिया।
”मैं ऋषि होकर इस साम्राज्य का क्या करूँगा, राजन्। तुम राजा की तरह शेष जीवन बिताओ।“
”यह असंभव है ऋषिवर। अब मैं राज-पाट त्याग कर, भगवान की सेवा करूँगा।“
बहुत कहने पर भी राजा हरिश्चंद्र ने अपना साम्राज्य वापस नहीं लिया। अंत में राजकुमार रोहिताश्व को युवराज बनाया गया। राजा हरिश्चंद्र ने रानी शैव्या के साथ वानप्रस्थ ग्रहण कर लिया।
राजा हरिश्चंद्र का त्याग और वचन-पालन, आदर्श है। वचन-पालन और त्याग के लिए राजा हरिश्चंद्र को आज भी याद किया जाता है।

गायत्री की दस भुजाएं

पार्वती ने पूछा, ‘‘प्रभु ! गायत्री की दश भुजाओं का क्या अर्थ है ?’शिव बोले, 

‘‘पार्वती ! मनुष्य जीवन के दस शूल अर्थात् कष्ट हैं। ये दस कष्ट है—

दोषयुक्त दृष्टि, परावलंबन, भय, क्षुद्रता, असावधानी, क्रोध, स्वार्थपरता, 

अविवेक, आलस्य और तृष्णा। गायत्री की दस भुजाएं 

इन दस कष्टों को नष्ट करने वाली हैं। 

इसके अतिरिक्त गायत्री की दाहिनी पांच भुजाएं मनुष्य के जीवन में 

पांच आत्मिक लाभ—आत्मज्ञान, आत्मदर्शन, आत्म-अनुभव, 

आत्म-लाभ और आत्म-कल्याण देने वाली हैं 

तथा गायत्री की बाईं पांच भुजाएं पांच सांसारिक लाभ—स्वास्थ्य, 

धन, विद्या, चातुर्य और दूसरों का सहयोग देने वाली हैं। 

दस भुजी गायत्री का चित्रण इसी आधार पर किया गया है। 

ये सभी जीवन विकास की दस दिशाएं हैं। 

माता के ये दस हाथ, साधक को उन दसो दिशाओं में सुख 

और समृद्धि प्रदान करते हैं। 

गायत्री के सहस्रो नेत्र, सहस्रों कर्ण, सहस्रों चरण भी कहे गए हैं। 

उसकी गति सर्वत्र है।


Thursday, 12 March 2015

एसी लागी लगन मीरां हो गई मगन

एसी लागी लगन...
एसी लागी लगन...
एसी लागी लगन... लागी रे..... लगन

एसी लागी लगन मीरां हो गई मगन (२)
वो तो गली गली हरि गुंन गाने लगी

महेलो में पली बनके जोगन चली (२)
मीरां दीवानी कहाने लगी


एसी लागी लगन मीरां हो गई मगन (२)
वो तो गली गली गली गली गाने लगी

कोई रोके नही कोई टोके नही
मीरां गोवीन्दा गोपाला गाने लगी
कोई रोके नही कोई टोके नही
कोई रोके नही कोई टोके नही

मीरां गोवीन्दा गोपाला गाने लगी
बेठी संतो के संग रंगी मोहन के रंग 

मीरां प्रेमी प्रीतम को मनाने लगी
वो तो गली गली हरि गुंन गाने लगी

एसी लागी लगन मीरां हो गई मगन (२)
वो तो गली गली गली गली गाने लगी
वो तो गली गली गली गली गाने लगी (२)

Thursday, 19 February 2015

हम हस रहे थे वोह देख रहे थे

हम हस रहे थे वोह देख रहे थे

हम रो रहे थे वोह मना रहे थे

हम उदास थे वोह खुसीयां दे रहे थे

हम सो रहे थे वोह रक्षण कर रहे थे

हम डरके मारे छुप रहे थे वोह बचा रहे थे

हमने पत्थर उठाया बचने के लीये वोह चल दीये अब तुं ही लड ले

हमें अपना  बचाव करना चाहीये मगर लडना नही चाहीये

सब कुछ उपर वाले छोड दें  वोह सब संभाल लेगा 

बस कार्य करते रहे

राधे कृष्ण






Wednesday, 18 February 2015

tu mane bhagwan ek vardaan aapi de

[tu mane bhagwan ek vardaan aapi de
jya vase che tu mane tya sthaan aapi de]…(2)
 
[hu jivu chu ae jagat ma jya nathi jeevan
zindagi nu naam che bas boj ne bandhan]…(2)
 
[aakhri avtaar nu mandaan bandhi de
jya vase che tu mane tya sthaan aapi de]…(2)
 
[tu mane bhagwan ek vardan aapi de
jya vase che tu mane tya sthaan aapi de]…(1)
 
[aa bhoomi ma khoob gaaje paap na padgham
besuri thai jayi amari punya ni sargam]…(2)
 
[dil rubana taar nu bhangan saandhi de
jya vase che tu mane tya sthaan aapi de]…(2)
 
[tu mane bhagwan ek vardaan aapi de
jya vase che tu mane tya sthaan aapi de]…(1)
 
[jo vatan ma jya Lagi che sau kare shoshan
jom a jata koi ahiya na kare poshan]…(2)
 
[matlabi sansar nu jo daan kaapi de
jya vaseche tu mane tya sthaan aapi de]….(4)
 
tu mane bhagwan ek vardaan aapi de
[jya vaseche tu mane tya staan aapi de]…(4)
 

Monday, 2 February 2015

ભોમિયા વિના મારે ભમવા’તા ડુંગરા

ભોમિયા વિના મારે ભમવા’તા ડુંગરા,

જંગલની કુંજકુંજ જોવી હતી;
જોવાં’તાં કોતરો ને જોવી’તી કંદરા,
રોતાં ઝરણાંની આંખ લ્હોવી હતી.

સૂના સરવરિયાની સોનેરી પાળે,
હંસોની હાર મારે ગણવી હતી;
ડાળે ઝૂલંત કોક કોકિલાને માળે,
અંતરની વેદના વણવી હતી.

એકલા આકાશ તળે ઊભીને એકલો,
પડઘા ઉરબોલના ઝીલવા ગયો;
વેરાયા બોલ મારા, ફેલાયા આભમાં,
એકલો, અટૂલો ઝાંખો પડ્યો.

આખો અવતાર મારે ભમવા ડુંગરિયા,
જંગલની કુંજકુંજ જોવી ફરી;
ભોમિયા ભૂલે એવી ભમવી રે કંદરા,
અંતરની આંખડી લ્હોવી જરી.

– ઉમાશંકર જોશી

હર હર મહાદેવ 


જંગલની કુંજ કુંજ જોવી હતી;

ભોમિયા વિના મારે ભમવા’તા ડુંગરા,
જંગલની કુંજ કુંજ જોવી હતી;
જોવી’તી કોતરો ને જોવી’તી કંદરા,
રોતા ઝરણાની આંખ લ્હોવી હતી.
સૂના સરવરિયાની સોનેરી પાળે,
હંસોની હાર મારે ગણવી હતી;
ડાળે ઝૂલંત કોક કોકિલાને માળે,
અંતરની વેદના વણવી હતી.
એકલા આકાશ તળે ઊભીને એકલો,
પડઘા ઉરબોલના ઝીલવા ગયો;
વેરાયા બોલ મારા, ફેલાયા આભમાં,
એકલો અટૂલો ઝાંખો પડ્યો.
આખો અવતાર મારે ભમવા ડુંગરિયા,
જંગલની કુંજકુંજની જોવી ફરી;
ભોમિયા ભૂલે એવી ભમવી રે કંદરા,
અંતરની આંખડી લ્હોવી જરી.
– ઉમાશંકર જોષી
(૨૧/૦૭/૧૯૧૧ – ૧૯/૧૨/૧૯૮૮)

તમારું મુલ્ય કેટલું છે તે તમારી ઉપર નિર્ભર છે

એક યુવાને એના પિતાને પૂછ્યું કે પપ્પા આ માનવજીવનનું મૂલ્ય શુ છે ? પિતાએ જવાબમાં દીકરાના હાથમાં એક પથ્થર મુક્યો અને કહ્યું, "તું આ પથ્થર...