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Friday, 14 November 2014

महामृत्युंजयमंत्र

ॐ त्रयंबकम यजामहे सुगंन्धी पुष्टिवर्धनम् उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मा मृतात्

Friday, 7 November 2014

जय जय जननी श्री गणेश की

जय जय जननी श्री गणेश की
जय जय जननी श्री गणेश की
प्रतीभा परमेश्वर परेश की
प्रतीभा परमेश्वर परेश की
जय जय जननी श्री गणेश की

जय महेश मुख चंन्द्र चंन्द्रीका
जय जय जय जय जगत अंबीका
जय महेश मुख चंन्द्र चंन्द्रीका
जय जय जय जय जगत अंबीका

वर दे मा वरदान दायनी
वर दे मा वरदान दायनी
बनु दायकी द्वारीकेश 
जय जय जननी श्री गणेश की

शविनय विनती सुन हरी आये 
आये अपनाये ले जाये 
शविनय विनती सुन हरी आये 
आये अपनाये ले जाये

सुखद सुखद बेना आये मा 
सुखद सुखद बेना आये मा
सर्व सुमंगल ग्रीह पर्वेश की
सर्व सुमंगल ग्रीह पर्वेश की
जय जय जननी श्री गणेश की

प्रतीभा परमेश्वर परेश की
जय जय जननी श्री गणेश की
जय जय जननी श्री गणेश की


Tuesday, 4 November 2014

सबसो उंची प्रेम सगाई

सबसे उंची प्रेम सगाई, सबसे उंची प्रेम सगाई,
दुर्योधन का मेवा त्यागे,
दुर्योधन का मेवा त्यागे,
दुर्योधन का मेवा त्यागे,
सगा वीदुर घेर पाई.
सबसे उंची प्रेम सगाई,
सबसे उंची प्रेम सगाई......

जुठे फल सबरी के खाये,
जुठे फल सबरी के खाये,
जुठे फल सबरी के खाये,
बहु विध प्रेम लगाये, सबसे उंची प्रेम सगाई.......

प्रेम से बैठ अर्जुन रथ हाक्यो,
प्रेम से बैठ अर्जुन रथ हाक्यो,
प्रेम से बैठ अर्जुन रथ हाक्यो, भुल गये ठकुराई, सबसे उची प्रेम सगाई.......

एईसी प्रीत बडी वरदाना,
एईसी प्रीत बडी वरदाना,
एईसी प्रीत बडी वरदाना, 
गोपीयां नाच नचाई, सबसे बडी प्रेम सगाई.......

सुरा अकुरा ईस लायक नाही, 
सुरा अकुरा ईस लायक नाही, 
सुरा अकुरा ईस लायक नाही, 
सबसे उंची प्रेम सगाई,
सबसे उंची प्रेम सगाई........




बीनती सुनीये, नाथ हमारी;

      सुभद्रा द्वारा कृष्ण को पत्र 

      बीनती सुनीये....
      बीनती सुनीये, नाथ हमारी; बीनती सुनीये, नाथ हमारी,
      रदयेस्वर हरी रदयेस्वर हरी,
      रदयेस्वर हरी रदयेस्वर हरी;
      मोर-मुकुट पीतांम्बरधारी, बीनती सुनीये नाथ हमारी.

      जनम जनम की लगी लगन है, हो.....,
       जनम जनम की लगी लगन है,
      साक्सी तारोन भरा गगन है,
      गीन गीन स्वास आस कहेती है,
      आयेगा श्री कृष्ण मुरारी,
      बीनती सुनीये, नाथ हमारी,

      सतत प्रतीक्षा अपलक लोचन, हो ओ ओ,
      सतत प्रतीक्षा अपलक लोचन, हे भवबाधा, वीपती- वीमोचन, स्वागत का अधीकार दीजीये,

      सरणागत है नयन पुजारी,
      बीनती सुनीये, नाथ हमारी,

      ओर कहुं क्या अंतरयामी, हो ओ ओ,
      तन मन धन प्राणो के स्वामी;
      करुणा कर आखर येह कीजीये,
      स्वीकारी बीनती स्वीकारी,
      बीनती सुनीये, नाथ हमारी,
      हदयस्वर हरि हदयेस्वरी,
      हदयस्वर हरि हदयेस्वरी;
      मोर-मुकुट पीतांम्बरधारी, 
      बीनती सुनीये, नाथ हमारी;
      बीनती सुनीये, नाथ हमारी;
      बीनती सुनीये.........नाथ हमारी.

Monday, 3 November 2014

महेनत के फल मीठे होते है

नथु नाम का एक किसान था़, साथ में आलसी भी था, उसके पास एक खेत था, मगर कभी खेत में ध्यान देता नही, खेत में आम, पेरु, अनार ओर बहोत कीसम के फल के पेड थे, पर पानी ओर खात की कमी की वजह से सुक जाते थे, बाप दादा की महेनत की कमाई जमा पुंजी से घर चलाता था, आलसी नथु पुरा दिन आराम ही करता कोई काम काज करता ही नही.


एक दिन सोया था तभी उसे सपना आया की तेरे खेत में धन छुपाया है, खोदकाम करेगा तो मीलेगा ! सुबह होते ही नथु ओजार लेके खेत में पहुच गया, नथु के मन में यही था की एक बार धनदोलत मील जाये तो पुरी जींदगी कोई काम करने की जरुरत ना रहे, बस जलसा ही जलसा ! दुपेर होते ही नथु की ओरत खाना लेकर आई, खाना खाने की बजाय खोदकाम चालु रखा, धन मीलने की आशा में पुरा खेत खोद डाला, फीर भी धन नही मीला ओर नीराश होकर बैठ गया.


बरसो से खेत वैसे का वैसा ही पडा था मगर ये साल नथु ने धन की लालच में जमीन खोद डाली थी उपर से बारीस भी अच्छी हुई थी ओर भगवान की ईच्छा से पेड पे फल भी अच्छे लगे थे, टोकरे भर भर के फल बेचा था ओर ईश्वर का शुक्र मानता था, कभी ईतनी उपज देखी नही थी!


महेनत करने वाले को ईश्वर जरुर देता है !!

महेनत के फल मीठे होते है !!

महेनत करने वाला कभी दुखी नही होता. 

ली सीमा 


Saturday, 25 October 2014

વિશ્વાસુના વિશ્વાસુ ઓ વિશ્વાસુના વિશ્વાસુ

વિશ્વાસુના વિશ્વાસુ ઓ વિશ્વાસુના વિશ્વાસુ
વિશ્વાસુના વિશ્વાસુ ઓ વિશ્વાસુના વિશ્વાસુ
નયન કમળથી ધારા વહેતી 
પ્રભુ નયન કમળથી ધારા વહેતી
પ્રભુ નયન કમળથી ધારા વહેતી
હદય કમળ છે પ્યાસું પ્રભુ છે
વિશ્વાસુના વિશ્વાસુ ઓ વિશ્વાસુના વિશ્વાસુ
હદય કમળ છે પ્યાસું પ્રભુ છે
વિશ્વાસુના વિશ્વાસુ ઓ વિશ્વાસુના વિશ્વાસુ
મારા કોણ સુકાવે આંસુ 
વિશ્વાસુના વિશ્વાસુ ઓ વિશ્વાસુના વિશ્વાસુ
તનમાં મનમાં દેહ ભુવનમાં 
તનમાં મનમાં દેહ ભુવનમાં તારી સબી પધરાવું
તનમાં મનમાં દેહ ભુવનમાં
તનમાં મનમાં દેહ ભુવનમાં તારી સબી પધરાવું
સરણે રહેવું ચરણે રહેવું અને મરણે તારો થાવું
સરણે રહેવું ચરણે રહેવું અને મરણે તારો થાવું
તુજ કાજે દિન દરવાજો પ્રભુ 
તુજ કાજે દિન દરવાજો પ્રભુ ખોલ્યો છે નહી વાશુ 
વિશ્વાસુના વિશ્વાસુ ઓ વિશ્વાસુના વિશ્વાસુ
વિશ્વાસુના વિશ્વાસુ ઓ વિશ્વાસુના વિશ્વાસુ


Friday, 17 October 2014

कैसा पुजारी है जो खुद चखकर भगवान को भोग

रामकृष्ण परमहंस को दक्षिणेश्वर में पुजारी की नौकरी मिली। बीस रुपये वेतन तय किया गया जो उस समय के लिए पर्याप्त था। लेकिन पंद्रह दिन ही बीते थे कि मंदिर कमेटी के सामने उनकी पेशी हो गई और कैफियत देने के लिए कहा गया। दरअसल एक के बाद एक अनेक शिकायतें उनके विरुद्ध कमेटी तक पहुंची थीं। किसी ने कहा कि यह कैसा पुजारी है जो खुद चखकर भगवान को भोग लगाता है। फूल सूंघ कर भगवान के चरणों में अर्पित करता है। पूजा के इस ढंग पर कमेटी के सदस्यों को बहुत आश्चर्य हुआ था। जब रामकृष्ण उनके पास पहुंचे तो एक सदस्य ने पूछा-यह कहां तक सच है कि तुम फूल सूंघ कर देवता पर चढ़ाते हो? रामकृष्ण परमहंस ने सहज भाव से जवाब दिया- मैं बिना सूंघे भगवान पर फूल क्यों चढ़ाऊं? पहले देख लेता हूं कि उस फूल से कुछ सुगंध भी आ रही है या नहीं? फिर दूसरी शिकायत रखी गई- सुनने में आया है कि भगवान को भोग लगाने से पहले खुद अपना भोग लगा लेते हो? रामकृष्ण ने फिर उसी भाव से जवाब दिया- मैं अपना भोग तो नहीं लगाता पर मुझे अपनी मां की याद है कि वे भी ऐसा ही करती थीं। जब कोई चीज बनाती थीं तो चख कर देख लेती थीं और तब मुझे खाने को देती थीं। मैं भी चखकर देखता हूं। पता नहीं जो चीज किसी भक्त ने भोग के लिए लाकर रखी है या मैंने बनाई है वह भगवान को देने योग्य है या नहीं। यह सुनकर कमेटी के सदस्य निरुत्तर हो गए।

તમારું મુલ્ય કેટલું છે તે તમારી ઉપર નિર્ભર છે

એક યુવાને એના પિતાને પૂછ્યું કે પપ્પા આ માનવજીવનનું મૂલ્ય શુ છે ? પિતાએ જવાબમાં દીકરાના હાથમાં એક પથ્થર મુક્યો અને કહ્યું, "તું આ પથ્થર...