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Saturday, 25 October 2014

વિશ્વાસુના વિશ્વાસુ ઓ વિશ્વાસુના વિશ્વાસુ

વિશ્વાસુના વિશ્વાસુ ઓ વિશ્વાસુના વિશ્વાસુ
વિશ્વાસુના વિશ્વાસુ ઓ વિશ્વાસુના વિશ્વાસુ
નયન કમળથી ધારા વહેતી 
પ્રભુ નયન કમળથી ધારા વહેતી
પ્રભુ નયન કમળથી ધારા વહેતી
હદય કમળ છે પ્યાસું પ્રભુ છે
વિશ્વાસુના વિશ્વાસુ ઓ વિશ્વાસુના વિશ્વાસુ
હદય કમળ છે પ્યાસું પ્રભુ છે
વિશ્વાસુના વિશ્વાસુ ઓ વિશ્વાસુના વિશ્વાસુ
મારા કોણ સુકાવે આંસુ 
વિશ્વાસુના વિશ્વાસુ ઓ વિશ્વાસુના વિશ્વાસુ
તનમાં મનમાં દેહ ભુવનમાં 
તનમાં મનમાં દેહ ભુવનમાં તારી સબી પધરાવું
તનમાં મનમાં દેહ ભુવનમાં
તનમાં મનમાં દેહ ભુવનમાં તારી સબી પધરાવું
સરણે રહેવું ચરણે રહેવું અને મરણે તારો થાવું
સરણે રહેવું ચરણે રહેવું અને મરણે તારો થાવું
તુજ કાજે દિન દરવાજો પ્રભુ 
તુજ કાજે દિન દરવાજો પ્રભુ ખોલ્યો છે નહી વાશુ 
વિશ્વાસુના વિશ્વાસુ ઓ વિશ્વાસુના વિશ્વાસુ
વિશ્વાસુના વિશ્વાસુ ઓ વિશ્વાસુના વિશ્વાસુ


Friday, 17 October 2014

कैसा पुजारी है जो खुद चखकर भगवान को भोग

रामकृष्ण परमहंस को दक्षिणेश्वर में पुजारी की नौकरी मिली। बीस रुपये वेतन तय किया गया जो उस समय के लिए पर्याप्त था। लेकिन पंद्रह दिन ही बीते थे कि मंदिर कमेटी के सामने उनकी पेशी हो गई और कैफियत देने के लिए कहा गया। दरअसल एक के बाद एक अनेक शिकायतें उनके विरुद्ध कमेटी तक पहुंची थीं। किसी ने कहा कि यह कैसा पुजारी है जो खुद चखकर भगवान को भोग लगाता है। फूल सूंघ कर भगवान के चरणों में अर्पित करता है। पूजा के इस ढंग पर कमेटी के सदस्यों को बहुत आश्चर्य हुआ था। जब रामकृष्ण उनके पास पहुंचे तो एक सदस्य ने पूछा-यह कहां तक सच है कि तुम फूल सूंघ कर देवता पर चढ़ाते हो? रामकृष्ण परमहंस ने सहज भाव से जवाब दिया- मैं बिना सूंघे भगवान पर फूल क्यों चढ़ाऊं? पहले देख लेता हूं कि उस फूल से कुछ सुगंध भी आ रही है या नहीं? फिर दूसरी शिकायत रखी गई- सुनने में आया है कि भगवान को भोग लगाने से पहले खुद अपना भोग लगा लेते हो? रामकृष्ण ने फिर उसी भाव से जवाब दिया- मैं अपना भोग तो नहीं लगाता पर मुझे अपनी मां की याद है कि वे भी ऐसा ही करती थीं। जब कोई चीज बनाती थीं तो चख कर देख लेती थीं और तब मुझे खाने को देती थीं। मैं भी चखकर देखता हूं। पता नहीं जो चीज किसी भक्त ने भोग के लिए लाकर रखी है या मैंने बनाई है वह भगवान को देने योग्य है या नहीं। यह सुनकर कमेटी के सदस्य निरुत्तर हो गए।

Friday, 15 August 2014

सुझाव

एक आदमी को किसी ने सुझाव दिया कि दूर से
पानी लाते हो, क्यों नहीं अपने घर के पास एक
कुआं खोद लेते? हमेशा के लिए
पानी की समस्या से छुटकारा मिल जाएगा।
सलाह मानकर उस आदमी ने कुआं खोदना शुरू
किया। लेकिन सात-आठ फीट खोदने के बाद
उसे पानी तो क्या, गीली मिट्टी का भी चिह्न
नहीं मिला। उसने वह जगह छोड़कर दूसरी जगह
खुदाई शुरू की। लेकिन दस फीट खोदने के बाद
भी उसमें पानी नहीं निकला। उसने तीसरी जगह
कुआं खोदा, लेकिन निराशा ही हाथ लगी। इस
क्रम में उसने आठ-दस फीट के दस कुएं खोद
डाले, पानी नहीं मिला। वह निराश होकर उस
आदमी के पास गया, जिसने कुआं खोदने
की सलाह दी थी।
उसे बताया कि मैंने दस कुएं खोद डाले,
पानी एक में भी नहीं निकला। उस
व्यक्ति को आश्चर्य हुआ। वह स्वयं
चल कर उस स्थान पर आया, जहां उसने दस
गड्ढे खोद रखे थे। उनकी गहराई देखकर वह
समझ गया। बोला, ‘दस कुआं खोदने की बजाए
एक कुएं में ही तुम अपना सारा परिश्रम और
पुरूषार्थ लगाते तो पानी कब का मिल
गया होता। तुम सब गड्ढों को बंद कर दो, केवल
एक को गहरा करते जाओ, पानी निकल
आएगा।’
कहने का मतलब यही कि आज
की स्थिति यही है। आदमी हर काम फटाफट
करना चाहता है। किसी के पास धैर्य नहीं है।
इसी तरह पचासों योजनाएं एक साथ चलाता है
और पूरी एक भी नहीं हो पाती।


बाज और किसान…


बहुत समय पहले की बात है , एक राजा को उपहार में किसी ने बाज के दो बच्चे भेंट किये । वे बड़ी ही अच्छी नस्ल के थे , और राजा ने कभी इससे पहले इतने शानदार बाज नहीं देखे थे।
राजा ने उनकी देखभाल के लिए एक अनुभवी आदमी को नियुक्त कर दिया।
जब कुछ महीने बीत गए तो राजा ने बाजों को देखने का मन बनाया , और उस जगह पहुँच गए जहाँ उन्हें पाला जा रहा था। राजा ने देखा कि दोनों बाज काफी बड़े हो चुके थे और अब पहले से भी शानदार लग रहे थे ।
राजा ने बाजों की देखभाल कर रहे आदमी से कहा, ” मैं इनकी उड़ान देखना चाहता हूँ , तुम इन्हे उड़ने का इशारा करो । “
आदमी ने ऐसा ही किया।
इशारा मिलते ही दोनों बाज उड़ान भरने लगे , पर जहाँ एक बाज आसमान की ऊंचाइयों को छू रहा था , वहीँ दूसरा , कुछ ऊपर जाकर वापस उसी डाल पर आकर बैठ गया जिससे वो उड़ा था।
ये देख , राजा को कुछ अजीब लगा.
“क्या बात है जहाँ एक बाज इतनी अच्छी उड़ान भर रहा है वहीँ ये दूसरा बाज उड़ना ही नहीं चाह रहा ?”, राजा ने सवाल किया।
” जी हुजूर , इस बाज के साथ शुरू से यही समस्या है , वो इस डाल को छोड़ता ही नहीं।”
राजा को दोनों ही बाज प्रिय थे , और वो दुसरे बाज को भी उसी तरह उड़ना देखना चाहते थे।
अगले दिन पूरे राज्य में ऐलान करा दिया गया कि जो व्यक्ति इस बाज को ऊँचा उड़ाने में कामयाब होगा उसे ढेरों इनाम दिया जाएगा।
फिर क्या था , एक से एक विद्वान् आये और बाज को उड़ाने का प्रयास करने लगे , पर हफ़्तों बीत जाने के बाद भी बाज का वही हाल था, वो थोडा सा उड़ता और वापस डाल पर आकर बैठ जाता।
फिर एक दिन कुछ अनोखा हुआ , राजा ने देखा कि उसके दोनों बाज आसमान में उड़ रहे हैं। उन्हें अपनी आँखों पर यकीन नहीं हुआ और उन्होंने तुरंत उस व्यक्ति का पता लगाने को कहा जिसने ये कारनामा कर दिखाया था।
वह व्यक्ति एक किसान था।
अगले दिन वह दरबार में हाजिर हुआ। उसे इनाम में स्वर्ण मुद्राएं भेंट करने के बाद राजा ने कहा , ” मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूँ , बस तुम इतना बताओ कि जो काम बड़े-बड़े विद्वान् नहीं कर पाये वो तुमने कैसे कर दिखाया। “
“मालिक ! मैं तो एक साधारण सा किसान हूँ , मैं ज्ञान की ज्यादा बातें नहीं जानता , मैंने तो बस वो डाल काट दी जिसपर बैठने का बाज आदि हो चुका था, और जब वो डाल ही नहीं रही तो वो भी अपने साथी के साथ ऊपर उड़ने लगा। “
दोस्तों, हम सभी ऊँचा उड़ने के लिए ही बने हैं। लेकिन कई बार हम जो कर रहे होते है उसके इतने आदि हो जाते हैं कि अपनी ऊँची उड़ान भरने की , कुछ बड़ा करने की काबिलियत को भूल जाते हैं। यदि आप भी सालों से किसी ऐसे ही काम में लगे हैं जो आपके सही potential के मुताबिक नहीं है तो एक बार ज़रूर सोचिये कि कहीं आपको भी उस डाल को काटने की ज़रुरत तो नहीं जिसपर आप बैठे हुए हैं ?

stories

“कोई तुम्हारी बुराई करता है”

बहुत समय पहले की बात है किसी गाँव में मोहन नाम का एक किसान रहता था . वह बड़ा मेहनती और ईमानदार था .
अपने अच्छे व्यवहार के कारण दूर -दूर तक उसे लोग जानते थे और उसकी प्रशंशा करते थे .
पर एक दिन जब देर शाम वह खेतों से काम कर लौट रहा था तभी रास्ते में उसने कुछ लोगों को बाते करते सुना , वे उसी के बारे में बात कर रहे थे .
मोहन अपनी प्रशंशा सुनने के लिए उन्हें बिना बताये धीरे -धीरे उनके पीछे चलने लगा , पर उसने उनकी बात सुनी तो पाया कि वे उसकी बुराई कर रहे थे , कोई कह रहा था कि , “ मोहन घमण्डी है .” , तो कोई कह रहा था कि ,” सब जानते हैं वो अच्छा होने का दिखावा करता है …”
मोहन ने इससे पहले सिर्फ अपनी प्रशंशा सुनी थी पर इस घटना का उसके दिमाग पर बहुत बुरा असर पड़ा और अब वह जब भी कुछ लोगों को बाते करते देखता तो उसे लगता वे उसकी बुराई कर रहे हैं . यहाँ तक कि अगर कोई उसकी तारीफ़ करता तो भी उसे लगता कि उसका मजाक उड़ाया जा रहा है .
धीरे -धीरे सभी ये महसूस करने लगे कि मोहन बदल गया है , और उसकी पत्नी भी अपने पति के व्यवहार में आये बदलाव से दुखी रहने लगी और एक दिन उसने पूछा , “ आज -कल आप इतने परेशान क्यों रहते हैं ;कृपया मुझे इसका कारण बताइये.”
मोहन ने उदास होते हुए उस दिन की बात बता दी . पत्नी को भी समझ नहीं आया कि क्या किया जाए पर तभी उसे ध्यान आया कि पास के ही एक गाँव में एक सिद्ध महात्मा आये हुए हैं , और वो बोली , “ स्वामी , मुझे पता चला है कि पड़ोस के गाँव में एक पहुंचे हुए संत आये हैं ।चलिये हम उनसे कोई समाधान पूछते हैं .”
अगले दिन वे महात्मा जी के शिविर में पहुंचे .
मोहन ने सारी घटना बतायी और बोला , महाराज उस दिन के बाद से सभी मेरी बुराई और झूठी प्रशंशा करते हैं , कृपया मुझे बताइये कि मैं वापस अपनी साख कैसे बना सकता हूँ ! !”
महात्मा मोहन कि समस्या समझ चुके थे .
“ पुत्र तुम अपनी पत्नी को घर छोड़ आओ और आज रात मेरे शिविर में ठहरो .”, महात्मा कुछ सोचते हुए बोले .
मोहन ने ऐसा ही किया , पर जब रात में सोने का समय हुआ तो अचानक ही मेढ़कों के टर्र -टर्र की आवाज आने लगी .
मोहन बोला , “ ये क्या महाराज यहाँ इतना कोलाहल क्यों है ?”
“पुत्र , पीछे एक तालाब है , रात के वक़्त उसमे मौजूद मेढक अपना राग अलापने लगते हैं !!!”
“पर ऐसे में तो कोई यहाँ सो नहीं सकता ??,” मोहान ने चिंता जताई।
“हाँ बेटा , पर तुम ही बताओ हम क्या कर सकते हैं , हो सके तो तुम हमारी मदद करो “, महात्मा जी बोले .
मोहन बोला , “ ठीक है महाराज , इतना शोर सुनके लगता है इन मेढकों की संख्या हज़ारों में होगी , मैं कल ही गांव से पचास -साठ मजदूरों को लेकर आता हूँ और इन्हे पकड़ कर दूर नदी में छोड़ आता हूँ .”
और अगले दिन मोहन सुबह -सुबह मजदूरों के साथ वहाँ पंहुचा , महात्मा जी भी वहीँ खड़े सब कुछ देख रहे थे .
तालाब जयादा बड़ा नहीं था , 8-10 मजदूरों ने चारों और से जाल डाला और मेढ़कों को पकड़ने लगे …थोड़ी देर की ही मेहनत में सारे मेढक पकड़ लिए गए.
जब मोहन ने देखा कि कुल मिला कर 50-60 ही मेढक पकडे गए हैं तब उसने माहत्मा जी से पूछा , “ महाराज , कल रात तो इसमें हज़ारों मेढक थे , भला आज वे सब कहाँ चले गए , यहाँ तो बस मुट्ठी भर मेढक ही बचे हैं .”
महात्मा जी गम्भीर होते हुए बोले , “ कोई मेढक कहीं नहीं गया , तुमने कल इन्ही मेढ़कों की आवाज सुनी थी , ये मुट्ठी भर मेढक ही इतना शोर कर रहे थे तुम्हे लगा हज़ारों मेढक टर्र -टर्र कर रहे हों .
पुत्र, इसी प्रकार जब तुमने कुछ लोगों को अपनी बुराई करते सुना तो तुम भी यही गलती कर बैठे , तुम्हे लगा कि हर कोई तुम्हारी बुराई करता है पर सच्चाई ये है कि बुराई करने वाले लोग मुठ्ठी भर मेढक के सामान ही थे. इसलिए अगली बार किसी को अपनी बुराई करते सुनना तो इतना याद रखना कि हो सकता है ये कुछ ही लोग हों जो ऐसा कर रहे हों , और इस बात को भी समझना कि भले तुम कितने ही अच्छे क्यों न हो ऐसे कुछ लोग होंगे ही होंगे जो तुम्हारी बुराई करेंगे।”
अब मोहन को अपनी गलती का अहसास हो चुका था , वह पुनः पुराना वाला मोहन बन चुका था.


Friends, मोहन की तरह हमें भी कुछ लोगों के व्यवहार को हर किसी का व्यवहार नहीं समझ लेना चाहिए और positive frame of mind से अपनी ज़िन्दगी जीनी चाहिए। हम कुछ भी कर लें पर life में कभी ना कभी ऐसी समस्या आ ही जाती है जो रात के अँधेरे में ऐसी लगती है मानो हज़ारों मेढक कान में टर्र-टर्र कर रहे हों। पर जब दिन के उजाले में हम उसका समाधान करने का प्रयास करते हैं तो वही समस्या छोटी लगने लगती है. इसलिए हमें ऐसी situations में घबराने की बजाये उसका solution खोजने का प्रयास करना चाहिए और कभी भी मुट्ठी भर मेढकों से घबराना नहीं चाहिए.

guru nanak story

Sunday, 20 July 2014

मटके में आठ प्रकार के जुठ

एक बार घूमते-घूमते कालिदास बाजार गये | वहाँ एक

महिला बैठी मिली | उसके पास एक मटका था और कुछ
प्यालियाँ पड़ी थी | कालिदास ने उस महिला से पूछा : ” क्या बेच
रही हो ? “ महिला ने जवाब दिया : ” महाराज ! मैं
पाप बेचती हूँ | “ कालिदास ने आश्चर्यचकित होकर पूछा : ” पाप
और मटके में ? “ महिला बोली : ” हाँ , महाराज ! मटके में पाप है
| “ कालिदास : ” कौन-सा पाप है ? “महिला : ” आठ पाप इस
मटके में है | मैं चिल्लाकर कहती हूँ की मैं पाप बेचती हूँ पाप …
और लोग पैसे देकर पाप ले जाते है|”
अब महाकवि कालिदास को और आश्चर्य हुआ : ” पैसे देकर
लोग पाप ले जाते है ? “महिला : ” हाँ , महाराज ! पैसे से
खरीदकर लोग पाप ले जाते है | “
कालिदास : ” इस मटके में आठ पाप कौन-कौन से है ? “
महिला : ” क्रोध ,बुद्धिनाश , यश का नाश , स्त्री एवं बच्चों के
साथ
अत्याचार और अन्याय , चोरी , असत्य आदि दुराचार , पुण्य
का नाश , और
स्वास्थ्य का नाश … ऐसे आठ प्रकार के पाप इस घड़े में है | “
कालिदास को कौतुहल हुआ की यह तो बड़ी विचित्र बात है |
किसी भी शास्त्र में नहीं आया है की मटके में आठ प्रकार के पाप
होते है | वे बोले : ” आखिरकार इसमें क्या है ? ” // महिला : ”
महाराज ! इसमें शराब है शराब ! “
कालिदास महिला की कुशलता पर प्रसन्न होकर बोले : ” तुझे
धन्यवाद है ! शराब में आठ प्रकार के पाप है यह तू जानती है
और ‘मैं पाप बेचती हूँ ‘ ऐसा कहकर बेचती है फिर भी लोग ले
जाते है |
Bkneelam

Saturday, 24 May 2014

MAHAMRITYUNJAY MANTRA

ATI VISHISHT ,ADBHUT ,DURLABH MAHAMRITYUNJAY MANTRA....

अति विशिष्ट, अद्भुत और दुर्लभ महामृत्युजय मंत्र- 





MANTRA:-

       "ॐ त्रयंबकं यजामहे सुगंधिम् पुष्टीवर्धनम ऊर्वारुकमिव स्तुता वरदा प्रयोदयंताम् आयुः प्राणं प्रजां पशुं ब्रम्ह वर्चसं मह्यम् दत्वा ब्रजत ब्रम्ह लोकं॥" 

ये बहुत ही विशिष्ट और अद्भुत महामृत्युंजय मंत्र है ,ये मंत्र हमें अपने गुरुदेव से प्राप्त हुआ है | इस मंत्र की ये विशेषता है कि इसका नित्य श्रवण करने से या जाप करने से वात ,पित्त और... कफ़ ,तीनो प्रकार के दोषों का नाश होता है| इस मंत्र का अगर पारद शिवलिंग के सामने पूर्ण श्रद्धा से जाप किया जाए,तो शरीर में कैसा भी रोग क्यों न हो ,वह धीरे धीरे कम होता ही है,और लगातार यदि जाप किया जाए तो रोग समाप्त भी हो जाता है|यदि पारद शिवलिंग पर गाय के कच्चे दूध और पानी मिश्रित जल से अभिषेक किया जाए तो ये प्रक्रिया और भी जल्दी संपन्न हो जाती हैं|मंत्र जाप या अभिषेक में मंत्र की आवृत्ति नित्य कम से कम १०८ बार अवश्य होना चाहिए| ||जय सदगुरुदेव||

તમારું મુલ્ય કેટલું છે તે તમારી ઉપર નિર્ભર છે

એક યુવાને એના પિતાને પૂછ્યું કે પપ્પા આ માનવજીવનનું મૂલ્ય શુ છે ? પિતાએ જવાબમાં દીકરાના હાથમાં એક પથ્થર મુક્યો અને કહ્યું, "તું આ પથ્થર...